श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  14.19.55 
कच्चिदेतत् त्वया पार्थ श्रुतमेकाग्रचेतसा।
तदापि हि रथस्थस् त् वं श्रुतवानेतदेव हि॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
पार्थ! क्या तुमने मेरी बात ध्यानपूर्वक सुनी है? युद्ध के समय भी तुमने रथ पर बैठकर इस सिद्धांत का ध्यान रखा था।
 
Partha! Have you listened to my advice with full concentration? Even during the war you listened to this principle while sitting on your chariot. 55.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)