श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  14.19.54 
वासुदेव उवाच
इत्युक्त्वा स तदा वाक्यं मां पार्थ द्विजसत्तम:।
मोक्षधर्माश्रित: सम्यक् तत्रैवान्तरधीयत॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - अर्जुन! मोक्षधर्म की शरण में आये हुए वे श्रेष्ठ ब्राह्मण मुझसे यह प्रसंग कहकर वहीं अन्तर्धान हो गये॥54॥
 
Lord Krishna says - Arjun! That great Brahmin, who had taken refuge in the path of Mokshadharma, after narrating this episode to me, disappeared from there itself. ॥ 54॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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