श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन  »  श्लोक 50-51
 
 
श्लोक  14.19.50-51 
जीवो नि ष् क्रान्तमात्मानं शरीरात् सम्प्रपश्यति।
स तमुत्सृज्य देहे स्वं धारयन् ब्रह्म केवलम्॥ ५०॥
आत्मानमालोकयति मनसा प्रहसन्निव।
तदेवमाश्रयं कृत्वा मोक्षं याति ततो मयि॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
तत्त्वज्ञानी जीवात्मा अपने को शरीर से पृथक् देखता है। शरीर के अन्दर रहते हुए भी उसे इसका त्याग कर देना चाहिए - इसकी पृथक् अनुभूति होने पर वह बुद्धि के द्वारा आत्मा का साक्षात्कार करता हुआ, केवल स्वरूप परमेश्वर का चिन्तन करता हुआ, उस समय वह यह सोचकर हँसता रहता है कि हे! मृगतृष्णा में दिखाई देने वाले जल के समान मेरे अन्दर प्रकट होने वाला यह संसार अब तक मुझे व्यर्थ ही भ्रमित कर रहा था। जो इस प्रकार भगवान् को देखता है, वह उनकी शरण ग्रहण करता है और अन्त में मुझमें मुक्त हो जाता है (अर्थात् अपने अन्दर ही परमेश्वर का अनुभव करने लगता है)। 50-51॥
 
The philosophical soul sees itself as separate from the body. Even while living inside the body, he should give up it - after experiencing its separateness, he realizes the soul with the help of his intellect, thinking only about the Supreme God in his form. At that time he keeps laughing thinking that oh! This world, which appeared within me like the water seen in a mirage, had till now unnecessarily confused me. One who sees God in this way, takes His shelter and ultimately becomes free in me (that is, he starts experiencing God within himself). 50-51॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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