श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  14.19.48 
न त्वसौ चक्षुषा ग्राह्यो न च सर्वैरपीन्द्रियै:।
मनसैव प्रदीपेन महानात्मा प्रदृश्यते॥ ४८॥
 
 
अनुवाद
उस परमात्मा को इन स्थूल नेत्रों से नहीं देखा जा सकता, उसे समस्त इन्द्रियों द्वारा भी नहीं पकड़ा जा सकता; उस महान आत्मा को केवल बुद्धिरूपी दीपक की सहायता से ही देखा जा सकता है ॥48॥
 
That Supreme Being cannot be seen with these physical eyes, He cannot be grasped even by all the senses; that great Self can be seen only with the help of the lamp of intellect. ॥ 48॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)