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श्लोक 14.19.48  |
न त्वसौ चक्षुषा ग्राह्यो न च सर्वैरपीन्द्रियै:।
मनसैव प्रदीपेन महानात्मा प्रदृश्यते॥ ४८॥ |
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| अनुवाद |
| उस परमात्मा को इन स्थूल नेत्रों से नहीं देखा जा सकता, उसे समस्त इन्द्रियों द्वारा भी नहीं पकड़ा जा सकता; उस महान आत्मा को केवल बुद्धिरूपी दीपक की सहायता से ही देखा जा सकता है ॥48॥ |
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| That Supreme Being cannot be seen with these physical eyes, He cannot be grasped even by all the senses; that great Self can be seen only with the help of the lamp of intellect. ॥ 48॥ |
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