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श्लोक 14.19.47  |
एवं सततमुद्युक्त: प्रीतात्मा नचिरादिव।
आसादयति तद्ब्रह्म यद्दृष्ट्वा स्यात् प्रधानवित्॥ ४७॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार ध्यान में निरन्तर प्रयत्नशील रहने वाले पुरुष का मन शीघ्र ही प्रसन्न हो जाता है और वह परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त हो जाता है, जिसके मिल जाने से मनुष्य स्वतः ही प्रकृति और उसके विकारों को समझ लेता है ॥ 47॥ |
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| In this way, the mind of a person who always strives for meditation soon becomes happy and he attains the Supreme Brahman, the Supreme Soul, by meeting whom a man automatically understands nature and its disorders. ॥ 47॥ |
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