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श्लोक 14.19.45-46  |
यथा स्वकोष्ठे प्रक्षिप्य भाण्डं भाण्डमना भवेत् ॥ ४५॥
तथा स्वकाये प्रक्षिप्य मनो द्वारैरनिश्चलै:।
आत्मानं तत्र मार्गेत प्रमादं परिवर्जयेत्॥ ४६॥ |
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| अनुवाद |
| जैसे मनुष्य घर की वस्तुओं को कमरे में रख देने पर भी उनके ही चिन्तन में मन लगाए रहता है, वैसे ही उसे चाहिए कि वह इन्द्रियों के चंचल द्वारों में विचरण करने वाले अपने मन को अपने शरीर में ही स्थित करे और वहाँ आत्मा का अन्वेषण करे तथा प्रमाद का त्याग कर दे ॥ 45-46॥ |
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| Just as a man keeps his mind engrossed in thinking about the household goods even after putting them away in his room, similarly, he should establish his mind, which wanders through the fickle doors of the senses, in his own body and inquire about the Self there and give up negligence. ॥ 45-46॥ |
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