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श्लोक 14.19.39  |
भुक्तं भुक्तमिदं कोष्ठे कथमन्नं विपच्यते।
कथं रसत्वं व्रजति शोणितत्वं कथं पुन:॥ ३९॥ |
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| अनुवाद |
| यह खाया हुआ अन्न बार-बार जठर में पहुँचकर किस प्रकार पचता है? इसका रस किस प्रकार बनता है और यह रक्त में किस प्रकार परिवर्तित होता है?॥39॥ |
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| ‘How does this food eaten repeatedly reach the stomach and get digested? How does its juice get formed and how does it get transformed into blood?॥ 39॥ |
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