| श्री महाभारत » पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व » अध्याय 19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन » श्लोक 37 |
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| | | | श्लोक 14.19.37  | दन्तांस्तालु च जिह्वां च गलं ग्रीवां तथैव च।
हृदयं चिन्तयेच्चापि तथा हृदयबन्धनम्॥ ३७॥ | | | | | | अनुवाद | | दांत, तालु, जिह्वा, कंठ, ग्रीवा, हृदय और हृदयनाल (तंत्रिका मार्ग) का भी दिव्य स्वरूप में चिन्तन करना चाहिए ॥37॥ | | | | One should also think about the teeth, palate, tongue, throat, neck, heart and heart canal (nerve path) in divine form. 37॥ | | ✨ ai-generated | | |
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