श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  14.19.35 
प्रचिन्त्यावसथे कृ त्स् नं यस्मिन् काले स पश्यति।
तस्मिन् काले मनश्चास्य न च किंचन बाह्यत:॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
जब वह मूलाधार आदि किसी आधार का ध्यान करके सर्वव्यापी परब्रह्म का अनुभव करता है, तब उसके मन में प्रत्यक्ष स्वरूप आत्मा के अतिरिक्त कोई बाह्य वस्तु नहीं रहती ॥35॥
 
When he experiences the all-pervading Supreme Being by meditating on any support such as the Mooladhar, then his mind does not remain any external thing apart from the direct form of the Self. ॥ 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)