श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  14.19.34 
पुरस्याभ्यन्तरे तिष्ठन् यस्मिन्नावसथे वसेत्।
तस्मिन्नावसथे धार्यं सबाह्याभ्यन्तरं मन:॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
शरीर के अन्दर रहते हुए भी आत्मा को बाह्य और आन्तरिक विषयों सहित अपने मन को उस आश्रय में रखना चाहिए जिसमें वह निवास करता है ॥34॥
 
While living inside the body, the soul should keep its mind including external and internal matters in the shelter in which it resides. 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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