सम्यग्युक्तो यदाऽऽत्मानमात्मन्येव प्रपश्यति।
तदैव न स्पृहयते साक्षादपि शतक्रतो:॥ ३२॥
अनुवाद
जब योगी पूर्णरूपेण योगाभ्यास करके अपने भीतर आत्मा का साक्षात्कार करने लगता है, तब वह स्वयं इन्द्रपद भी प्राप्त करने की इच्छा नहीं रखता ॥32॥
When a yogi, after practising Yoga thoroughly, begins to realise the Self within himself, then he does not even wish to attain the position of Indra himself. ॥ 32॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥