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mahabharat 14.19.31: वह इस मानव शरीर को छोड़कर अपनी इच्छानुसार अनेक शरीर धारण करता है। योगजनित ऐश्वर्य का उपभोग करने वाले योगी को किसी भी प्रकार योग से विमुख नहीं होना चाहिए ॥31॥   |   mahabharat अध्याय 14.19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  14.19.31 
देहान्यथेष्टमभ्येति हित्वेमां मानुषीं तनुम्।
निर्वेदस्तु न कर्तव्यो भुञ्जानेन कथंचन॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
वह इस मानव शरीर को छोड़कर अपनी इच्छानुसार अनेक शरीर धारण करता है। योगजनित ऐश्वर्य का उपभोग करने वाले योगी को किसी भी प्रकार योग से विमुख नहीं होना चाहिए ॥31॥
 
He leaves this human body and takes on many other bodies according to his wish. A Yogi who enjoys the opulence generated by Yoga should not become detached from Yoga in any way. ॥ 31॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)