श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  14.19.28 
दु:खशोकमयैर्घोरै: सङ्गस्नेहसमुद्भवै:।
न विचाल्यति युक्तात्मा नि:स्पृह: शान्तमानस:॥ २८॥
 
 
अनुवाद
शान्त और वैराग्यवान योगी आसक्ति और ममता से उत्पन्न होने वाले भयंकर दुःख, शोक और भय से विचलित नहीं होता ॥28॥
 
A peaceful and dispassionate yogi is not disturbed by the terrible pain, sorrow and fear that comes from attachment and affection. 28॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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