श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  14.19.10 
अगन्धमरसस्पर्शमशब्दमपरिग्रहम्।
अरूपमनभिज्ञेयं दृष्ट्वाऽऽत्मानं विमुच्यते॥ १०॥
 
 
अनुवाद
जो यह मानता है कि आत्मा गंध, रस, स्पर्श, शब्द, परिग्रह, रूप से रहित है और अज्ञेय है, वह मुक्त हो जाता है ॥10॥
 
He who believes that the Self is devoid of smell, taste, touch, sound, possessions, form and is unknowable, becomes free. ॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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