श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 19: गुरु-शिष्यके संवादमें मोक्षप्राप्तिके उपायका वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  14.19.1 
ब्राह्मण उवाच
य: स्यादेकायने लीनस्तूष्णीं किंचिदचिन्तयन्।
पूर्वं पूर्वं परित्यज्य स तीर्णो बन्धनाद् भवेत् ॥ १॥
 
 
अनुवाद
सिद्ध ब्राह्मण बोले - काश्यप! जो पुरुष अपने पूर्वजन्म (क्रमशः स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर) के अभिमान को त्याग देता है, किसी भी विषय में विचार नहीं करता, मौन रहकर सबके एकमात्र धाम - परमेश्वर में लीन रहता है, वह संसार के बंधन से मुक्त है॥1॥
 
Siddha Brahmin said – Kashyap! The man who gives up the pride of his past (in the gross, subtle and causal bodies respectively) and does not think about anything and remains silent and remains absorbed in the sole abode of all – the Supreme God, he is free from the bondage of the world. 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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