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mahabharat 14.18.33-34: जो पुरुष जन्म, मृत्यु और रोगों से घिरे हुए पुरुष तत्त्व (प्रकृति) को जानता है और समस्त चेतन प्राणियों में समान रूप से व्याप्त चेतना को देखता है, वह परम तत्व की खोज में लग जाता है और संसार के भोगों से विरक्त हो जाता है। साधुशिरोमणि! उस त्यागी पुरुष के लिए जो हितकर उपदेश है, उसे मैं विस्तारपूर्वक कहूँगा।   |   mahabharat अध्याय 14.18: जीवके गर्भ-प्रवेश,आचार-धर्म, कर्म-फलकी अनिवार्यता तथा संसारसे तरनेके उपायका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.18.33-34 
जातीमरणरोगैश्च समाविष्ट: प्रधानवित्।
चेतनावत्सु चैतन्यं समं भूतेषु पश्यति॥ ३३॥
निर्विद्यते तत: कृत्स्नं मार्गमाण: परं पदम्।
तस्योपदेशं वक्ष्यामि याथातथ्येन सत्तम॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
जो पुरुष जन्म, मृत्यु और रोगों से घिरे हुए पुरुष तत्त्व (प्रकृति) को जानता है और समस्त चेतन प्राणियों में समान रूप से व्याप्त चेतना को देखता है, वह परम तत्व की खोज में लग जाता है और संसार के भोगों से विरक्त हो जाता है। साधुशिरोमणि! उस त्यागी पुरुष के लिए जो हितकर उपदेश है, उसे मैं विस्तारपूर्वक कहूँगा।
 
One who knows the male principle (Prakriti), surrounded by birth, death and diseases and sees consciousness equally prevalent in all conscious beings, gets engaged in the search for the absolute ultimate and becomes detached from the pleasures of the world. Sadhushiromane! I will describe in detail the advice which is beneficial for that man of renunciation.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)