श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 18: जीवके गर्भ-प्रवेश,आचार-धर्म, कर्म-फलकी अनिवार्यता तथा संसारसे तरनेके उपायका वर्णन  »  श्लोक 31-32
 
 
श्लोक  14.18.31-32 
सुखदु:खे यथा सम्यगनित्ये य: प्रपश्यति।
कायं चामेध्यसंघातं विनाशं कर्मसंहितम्॥ ३१॥
यच्च किंचित्सुखं तच्च दु:खं सर्वमिति स्मरन्।
संसारसागरं घोरं तरिष्यति सुदुस्तरम्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य सुख और दुःख दोनों को अनित्य मानता है, शरीर को अशुद्ध वस्तुओं का समूह मानता है, मृत्यु को कर्मों का फल मानता है, तथा जो कुछ सुखरूप दिखाई देता है, वह सब दुःख के अतिरिक्त कुछ नहीं है, ऐसा मानता है, वह इस भयानक और कठिन संसार सागर को पार कर जाता है ॥31-32॥
 
A man who considers both pleasure and pain to be temporary, considers the body to be a collection of impure objects, considers death to be the result of actions, and believes that all that appears as pleasure is nothing but pain, will cross the terrible and difficult ocean of the world. ॥31-32॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)