काश्यप उवाच
कथं शरीरं च्यवते कथं चैवोपपद्यते।
कथं कष्टाच्च संसारात् संसरन् परिमुच्यते॥ २॥
अनुवाद
कश्यप ने पूछा - महात्मा ! यह शरीर कैसे छूटता है ? फिर दूसरा शरीर कैसे प्राप्त होता है ? संसारी प्राणी इस दुःखमय संसार से कैसे मुक्त होता है ?॥ 2॥
Kashyap asked - Mahatma! How does this body fall away? Then how does one get another body? How does a worldly being get free from this sorrowful world?॥ 2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥