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श्लोक 14.16.41-42  |
उपलब्धा द्विजश्रेष्ठ तथेयं सिद्धिरुत्तमा।
इत: परं गमिष्यामि तत: परतरं पुन:॥ ४१॥
ब्रह्मण: पदमव्यक्तं मा तेऽभूदत्र संशय:।
नाहं पुनरिहागन्ता मर्त्यलोकं परंतप॥ ४२॥ |
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| अनुवाद |
| हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! इस प्रकार मैंने यह परम सिद्धि प्राप्त कर ली है। इसके बाद मैं उत्तम लोक में जाऊँगा। फिर परम उत्तम सत्यलोक में पहुँचकर क्रमशः अव्यक्त ब्रह्म (मोक्ष) पद को प्राप्त करूँगा। इसमें तुम्हें कोई संदेह नहीं होना चाहिए। हे काम, क्रोध आदि शत्रुओं को पीड़ा देने वाले कश्यप! अब मैं इस मृत्युलोक में पुनः नहीं आऊँगा। ॥41-42॥ |
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| O best of the Brahmins! Thus I have achieved this supreme success. After this I will go to the best world. Then I will reach the most excellent Satyalok and gradually I will attain the state of unmanifested Brahma (salvation). You should not have any doubts about this. O Kashyap, who torments the enemies like lust, anger etc.! Now I will not come to this mortal world again. ॥ 41-42॥ |
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