| श्री महाभारत » पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व » अध्याय 113: भगवान् के उपदेशका उपसंहार और द्वारकागमन » श्लोक d45-d46 |
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| | | | श्लोक 14.113.d45-d46  | कृष्णोऽपि भगवान् देव: पृथामामन्त्र्य चार्तवत्।
धृतराष्ट्रं च गान्धारीं विदुरं द्रौपदीं तथा॥
कृष्णद्वैपायनं व्यासमृषीनन्यांश्च मन्त्रिण:।
सुभद्रामात्मजयुतामुत्तरां स्पृश्य पाणिना।
निर्गत्य वेश्मनस्तस्मादारुरोह तदा रथम्॥ | | | | | | अनुवाद | | देवेश्वर भगवान श्रीकृष्ण भी उनकी दशा देखकर दुःखी हो गये और कुन्ती, धृतराष्ट्र, गांधारी, विदुर, द्रौपदी, महर्षि व्यास तथा अन्य ऋषियों एवं मन्त्रियों से विदा लेकर उन्होंने सुभद्रा तथा उसके पुत्र सहित उत्तरा की पीठ पर हाथ फेरा और उन्हें आशीर्वाद देकर वे उस महल से बाहर निकलकर रथ पर सवार हो गये। | | | | Deveshwar Lord Shri Krishna also became sad after seeing their condition and after taking leave from Kunti, Dhritarashtra, Gandhari, Vidur, Draupadi, Maharishi Vyas and other sages and ministers, he touched the back of Uttara along with Subhadra and his son and after blessing them, they came out of that palace and boarded the chariot. | | ✨ ai-generated | | |
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