श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 113: भगवान‍् के उपदेशका उपसंहार और द्वारकागमन  »  श्लोक d20
 
 
श्लोक  14.113.d20 
आनृशंस्यमहिंसा च यथा सत्यं तथाऽऽर्जवम्।
अद्रोहश्चैव भूतानां मद्‍गतानां व्रतं नृप॥
 
 
अनुवाद
राजन! क्रूरता का अभाव, अहिंसा, सत्य, सरलता और किसी भी प्राणी के साथ द्रोह न करना - यही मेरे भक्तों का व्रत है।
 
King! Absence of cruelty, non-violence, truth, simplicity and not betraying any living being - this is the vow of my devotees.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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