श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 113: भगवान‍् के उपदेशका उपसंहार और द्वारकागमन  »  श्लोक d2
 
 
श्लोक  14.113.d2 
श्रीभगवानुवाच
श्रूयतामाहिताग्नेस्तु तथाभूतस्य संस्क्रिया।
पालाशवृन्दै: प्रतिमा कर्तव्या कल्पचोदिता॥
 
 
अनुवाद
श्री भगवान बोले - राजन! यदि किसी अग्निहोत्री ब्राह्मण की इस प्रकार मृत्यु हो जाए, तो उसके अंतिम संस्कार के लिए प्रेतकल्प में बताई गई विधि के अनुसार काष्ठ की मूर्ति बनानी चाहिए। लकड़ी पलाश की ही होनी चाहिए।
 
Sri Bhagavan said - King! If an Agnihotri Brahmin dies in this manner, then for his last rites, a wooden statue should be made as prescribed in the Pretakalp. It is advisable that the wood should be of Palaash wood only.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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