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mahabharat 14.112.d5: मैं उसे श्रेष्ठ ब्राह्मण मानता हूँ जो क्षमाशील, अनुशासित, क्रोध से रहित और मन तथा इन्द्रियों पर नियंत्रण रखने वाला है। उसके अतिरिक्त जो भी ब्राह्मण कहलाते हैं, वे सब शूद्र माने जाते हैं।   |   mahabharat अध्याय 14.112: उत्तम और अधम ब्राह्मणोंके लक्षण, भक्त, गौ और पीपलकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 112: उत्तम और अधम ब्राह्मणोंके लक्षण, भक्त, गौ और पीपलकी महिमा  »  श्लोक d5
 
 
श्लोक  14.112.d5 
क्षान्तं दान्तं जितक्रोधं जितात्मानं जितेन्द्रियम्।
तमग्रॺं ब्राह्मणं मन्ये शेषा: शूद्रा इति स्मृता:॥
 
 
अनुवाद
मैं उसे श्रेष्ठ ब्राह्मण मानता हूँ जो क्षमाशील, अनुशासित, क्रोध से रहित और मन तथा इन्द्रियों पर नियंत्रण रखने वाला है। उसके अतिरिक्त जो भी ब्राह्मण कहलाते हैं, वे सब शूद्र माने जाते हैं।
 
I consider him to be a great Brahmin who is forgiving, disciplined, free from anger and has control over his mind and senses. Apart from him, all those who are called Brahmins are considered Shudras.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)