Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 14.112.d3-d4: यदि हृदय की भावनाएँ शुद्ध नहीं हैं, तो त्रिदण्ड धारण करना, मौन रहना, जटाएँ रखना, मृगचर्म धारण करना, व्रत और अभिषेक करना, अग्नि में आहुति देना, गृहस्थ धर्म का पालन करना, स्वाध्याय करना और अपनी पत्नी का आदर करना - ये सभी कर्म व्यर्थ हो जाते हैं। | mahabharat अध्याय 14.112: उत्तम और अधम ब्राह्मणोंके लक्षण, भक्त, गौ और पीपलकी महिमा । mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
त्रिदण्डधारणं मौनं जटाधारणमुण्डनम्।
वल्कलाजिनसंवासो ब्रह्मचर्याभिषेचनम्॥
अग्निहोत्रं गृहे वास: स्वाध्यायं दारसत्क्रिया।
सर्वाण्येतानि वै मिथ्या यदि भावो न निर्मल:॥
अनुवाद
यदि हृदय की भावनाएँ शुद्ध नहीं हैं, तो त्रिदण्ड धारण करना, मौन रहना, जटाएँ रखना, मृगचर्म धारण करना, व्रत और अभिषेक करना, अग्नि में आहुति देना, गृहस्थ धर्म का पालन करना, स्वाध्याय करना और अपनी पत्नी का आदर करना - ये सभी कर्म व्यर्थ हो जाते हैं।
If the sentiments of the heart are not pure, then carrying the tridanda, maintaining silence, keeping matted hair, shaving the forehead, wearing bark or deerskin, observing fasts and performing abhishekam, offering oblations in the fire, observing the duties of a householder, engaging in self-study and treating one's wife with respect - all these acts become futile.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥