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mahabharat 14.112.d15-d16: भरतनंदन! मैंने जिन चौदह ज्ञान तीर्थों का पूर्ण वर्णन किया है, वे तीनों लोकों के कल्याण के लिए प्रकट हुए हैं। अतः शूद्रों को उनका स्पर्श नहीं करना चाहिए। युधिष्ठिर! इसमें कोई संदेह नहीं कि शूद्र के संपर्क में आने वाली प्रत्येक वस्तु अपवित्र हो जाती है।   |   mahabharat अध्याय 14.112: उत्तम और अधम ब्राह्मणोंके लक्षण, भक्त, गौ और पीपलकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.112.d15-d16 
यान्युक्तानि मया सम्यग् विद्यास्थानानि भारत।
उत्पन्नानि पवित्राणि भुवनार्थं तथैव च॥
तस्मात् तानि न शूद्रस्य स्पृष्टव्यानि युधिष्ठिर।
सर्वं च शूद्रसंस्पृष्टमपवित्रं न संशय:॥
 
 
अनुवाद
भरतनंदन! मैंने जिन चौदह ज्ञान तीर्थों का पूर्ण वर्णन किया है, वे तीनों लोकों के कल्याण के लिए प्रकट हुए हैं। अतः शूद्रों को उनका स्पर्श नहीं करना चाहिए। युधिष्ठिर! इसमें कोई संदेह नहीं कि शूद्र के संपर्क में आने वाली प्रत्येक वस्तु अपवित्र हो जाती है।
 
Bharatnandan! The fourteen holy places of knowledge which I have described in full, have appeared for the welfare of all three worlds. Therefore, Shudras should not touch them. Yudhisthira! There is no doubt that everything that comes in contact with a Shudra becomes impure.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)