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mahabharat 14.111.d36: कोई आदर करे या अपमान, पूजा करे या तिरस्कार, गाली दे या फटकार, इन सब परिस्थितियों में जो क्षमाशील रहता है, उसे तीर्थ कहते हैं।   |   mahabharat अध्याय 14.111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 111: विषुवयोग और ग्रहण आदिमें दानकी महिमा, पीपलका महत्त्व, तीर्थभूत गुणोंकी प्रशंसा और उत्तम प्रायश्चित्त  »  श्लोक d36
 
 
श्लोक  14.111.d36 
मानितोऽमानितो वापि पूजितोऽपूजितोऽपि वा।
आक्रुष्टस्तर्जितो वापि क्षमावांस्तीर्थमुच्यते॥
 
 
अनुवाद
कोई आदर करे या अपमान, पूजा करे या तिरस्कार, गाली दे या फटकार, इन सब परिस्थितियों में जो क्षमाशील रहता है, उसे तीर्थ कहते हैं।
 
Whether someone respects or insults, worships or despises, abuses or rebukes, the one who remains forgiving in all these circumstances is called a Tirtha.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)