vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Articles
Apps
About
श्री महाभारत
»
पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व
»
अध्याय 110: सर्वहितकारी धर्मका वर्णन, द्वादशी-व्रतका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके द्वारा भगवान्की स्तुति
»
श्लोक d33
श्लोक
14.110.d33
गन्धं पुष्पं फलं तोयं पत्रं वा मूलमेव वा।
द्वादश्यां मम यो दद्यात् तत्समो नास्ति मत्प्रिय:॥
अनुवाद
जो द्वादशी तिथि को मुझे चंदन, फूल, फल, जल, पत्ते या मूल अर्पित करता है, उसके समान मुझे कोई भी भक्त प्रिय नहीं है।
There is no devotee as dear to me as the one who offers me sandalwood, flowers, fruits, water, leaves or roots on the Dwadashi tithi.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×