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mahabharat 14.110.d29: इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति श्रावण में भी भक्तिपूर्वक मन से मेरी पूजा करता है, तो उसे मेरी ही मुक्ति प्राप्त होती है, अन्यथा सोचने की आवश्यकता नहीं है।   |   mahabharat अध्याय 14.110: सर्वहितकारी धर्मका वर्णन, द्वादशी-व्रतका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके द्वारा भगवान‍्की स्तुति   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.110.d29 
श्रावणेऽप्येवमेवं मामर्चयेद् भक्तिमान् नर:।
मम सालोक्यमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा॥
 
 
अनुवाद
इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति श्रावण में भी भक्तिपूर्वक मन से मेरी पूजा करता है, तो उसे मेरी ही मुक्ति प्राप्त होती है, अन्यथा सोचने की आवश्यकता नहीं है।
 
Similarly, even in Shravan, if a person worships me with a devotional mind, he attains my salvation, there is no need to think otherwise.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)