श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 110: सर्वहितकारी धर्मका वर्णन, द्वादशी-व्रतका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके द्वारा भगवान‍्की स्तुति  »  श्लोक d22
 
 
श्लोक  14.110.d22 
द्वादश्यां ज्येष्ठमासे तु मामुपोष्य त्रिविक्रमम्।
अर्चयेद् य: समाप्नोति गवां मेधफलं नृप॥
 
 
अनुवाद
राजन! जो मनुष्य ज्येष्ठ मास की द्वादशी तिथि को व्रत रखता है और 'त्रिविक्रम' नाम से मेरी पूजा करता है, उसे गोमेध का फल प्राप्त होता है।
 
Rajan! The person who fasts on the twelfth day of Jyeshtha month and worships me in the name 'Trivikram', he gets the fruit of Gomedha.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)