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mahabharat 14.107.d45: जिस देश में कृष्णसार नामक मृग स्वाभाविक रूप से विचरण करता है, वह देश यज्ञ करने के लिए उपयोगी है; उसके अतिरिक्त वह देश म्लेच्छों का देश है।   |   mahabharat अध्याय 14.107: आपद्धर्म, श्रेष्ठ और निन्द्य ब्राह्मण, श्राद्धका उत्तम काल और मानव-धर्म-सारका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.107.d45 
कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावत:।
स ज्ञेयो याज्ञिको देशो म्लेच्छदेशस्तत: परम्॥
 
 
अनुवाद
जिस देश में कृष्णसार नामक मृग स्वाभाविक रूप से विचरण करता है, वह देश यज्ञ करने के लिए उपयोगी है; उसके अतिरिक्त वह देश म्लेच्छों का देश है।
 
The country where the deer called Krishnasaar naturally roams is the country useful for performing yajnas; other than that is the country of the mlechchas.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)