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mahabharat 14.106.d17: पाण्डुनन्दन! इसी प्रकार पीकर बचा हुआ जल भी पुनः पीने योग्य नहीं रहता। यदि कोई ब्राह्मण मोहवश उसे पी ले, तो उसे चान्द्रायण व्रत करना चाहिए।   |   mahabharat अध्याय 14.106: भोजनकी विधि, गौओंको घास डालनेका विधान और तिलका माहात्म्य तथा ब्राह्मणके लिये तिल और गन्ना पेरनेका निषेध   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.106.d17 
पीतशेषं तु तन्नाम न पेयं पाण्डुनन्दन।
पिबेद् यदि हि तन्मोहाद् द्विजश्चान्द्रायणं चरेत्॥
 
 
अनुवाद
पाण्डुनन्दन! इसी प्रकार पीकर बचा हुआ जल भी पुनः पीने योग्य नहीं रहता। यदि कोई ब्राह्मण मोहवश उसे पी ले, तो उसे चान्द्रायण व्रत करना चाहिए।
 
Pandunandan! Similarly, the water left after drinking is also not fit to drink again. If a Brahmin drinks it out of temptation then he should observe Chandrayaan-Vrat.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)