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mahabharat 14.106.d15: जो पापी स्त्री के बर्तन में भोजन करता है, स्त्री का जूठा खाता है तथा स्त्री के साथ उसी बर्तन में भोजन करता है, वह मदिरा पीने के समान है। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए बुद्धिमान ऋषियों ने कोई प्रायश्चित नहीं देखा है।   |   mahabharat अध्याय 14.106: भोजनकी विधि, गौओंको घास डालनेका विधान और तिलका माहात्म्य तथा ब्राह्मणके लिये तिल और गन्ना पेरनेका निषेध   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  14.106.d15 
स्त्रीपात्रभुङ्नर: पाप: स्त्रीणामुच्छिष्टभुक्तथा।
तया सह च यो भुङ्‍क्ते स भुङ्‍क्ते मद्यमेव हि।
न तस्य निष्कृतिर्दृष्टा मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभि:॥
 
 
अनुवाद
जो पापी स्त्री के बर्तन में भोजन करता है, स्त्री का जूठा खाता है तथा स्त्री के साथ उसी बर्तन में भोजन करता है, वह मदिरा पीने के समान है। इस पाप से मुक्ति पाने के लिए बुद्धिमान ऋषियों ने कोई प्रायश्चित नहीं देखा है।
 
A sinner who eats in a vessel used by a woman, eats the leftovers of a woman and eats in the same vessel with a woman is like drinking alcohol. The wise sages have not seen any atonement for getting rid of this sin.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)