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mahabharat 14.104.d30: जीव अकेला ही जन्म लेता है, अकेला ही मरता है, अपने पुण्य कर्मों का फल भोगता है और अपने पापों का फल भी अकेला ही भोगता है।   |   mahabharat अध्याय 14.104: ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 104: ब्रह्महत्याके समान पापका, अन्नदानकी प्रशंसाका, जिनका अन्न वर्जनीय है उन पापियोंका, दानके फलका और धर्मकी प्रशंसाका वर्णन  »  श्लोक d30
 
 
श्लोक  14.104.d30 
एक: प्रजायते जन्तुरेक एव प्रमीयते।
एकोऽनुभुङ्‍क्ते सुकृतमेकश्चाप्नोति दुष्कृतम्॥
 
 
अनुवाद
जीव अकेला ही जन्म लेता है, अकेला ही मरता है, अपने पुण्य कर्मों का फल भोगता है और अपने पापों का फल भी अकेला ही भोगता है।
 
A living being is born alone, dies alone, enjoys the fruits of his good deeds and suffers the consequences of his sins alone.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)