श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 103: कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन  »  श्लोक d7
 
 
श्लोक  14.103.d7 
मनसा कर्मणा वाचा मतिपूर्वं युधिष्ठिर।
पापं रात्रिकृतं हन्यादस्याध्यायस्य पाठक:॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर! जो मनुष्य इस अध्याय का पाठ करता है, वह रात्रि में मन, वाणी या कर्म से जान-बूझकर किए गए समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
 
Yudhishthira! One who recites this chapter becomes free from all sins committed knowingly by thought, speech or action at night.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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