श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 103: कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन  »  श्लोक d38
 
 
श्लोक  14.103.d38 
श्रीभगवानुवाच
दैवं पूर्वाह्णिकं ज्ञेयं पैतृकं चापराह्णिकम्।
कालहीनं च यद् दानं तद् दानं राजसं विदु:॥
 
 
अनुवाद
श्री भगवान बोले- युधिष्ठिर! देवकर्म (यज्ञ) प्रातःकाल और पितृकर्म (श्राद्ध) मध्याह्न काल में करना चाहिए। जो दान अनुचित समय पर किया जाता है, वह राजस माना जाता है।
 
Shri Bhagwan said- Yudhishthira! Devkarma (Yagya) should be done in the morning and Pitrakarma (Shraddha) should be done in the afternoon. The donation which is done at an inappropriate time is considered to be Rajas.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas