श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 103: कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन  »  श्लोक d37
 
 
श्लोक  14.103.d37 
युधिष्ठिर उवाच
देवदेवेश दैत्यघ्न काल: को हव्यकव्ययो:।
के तत्र पूजामर्हन्ति वर्जनीयाश्च के द्विजा:॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर ने पूछा - हे दैत्यों के नाश करने वाले देवदेवेश्वर! हव्य (यज्ञ) और काव्य (श्राद्ध) के लिए कौन-सा समय उत्तम है? उसमें किन ब्राह्मणों का पूजन करना चाहिए और किनका त्याग करना चाहिए?
 
Yudhishthir asked – Devdeveshwar, destroyer of demons! Which is the best time for Havya (Yagya) and poetry (Shraddha)? Which Brahmins should be worshiped in it and which should be abandoned?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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