श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 103: कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन  »  श्लोक d35-d36
 
 
श्लोक  14.103.d35-d36 
अहो रत्नमिदं पुण्यं सर्वदु:खघ्नमुत्तमम्।
अहो धर्मार्जितं शुद्धमिदमग्रॺं महाधनम्॥
इत्याकाशस्थितास्ते तु सर्वदेवा जपन्ति च॥
 
 
अनुवाद
सभी देवता आकाश में खड़े होकर कहते हैं, 'ओह! कपिला गाय के रूप में यह रत्न कितना पवित्र और उत्तम है! यह सभी दुखों को दूर करता है। ओह! यह धर्म से अर्जित शुद्ध, उत्तम और महान धन है।'
 
All the gods stand in the sky and say, 'Oh! How pure and excellent is this gem in the form of Kapila cow! It removes all sorrows. Oh! This is pure, excellent and great wealth earned through Dharma.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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