श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 103: कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन  »  श्लोक d34
 
 
श्लोक  14.103.d34 
ब्रह्मणोत्पादिता देवी वह्निकुण्डान्महाप्रभा।
नमस्ते कपिले पुण्ये सर्वदेवैर्नमस्कृते॥
कपिलेऽथ महासत्त्वे सर्वतीर्थमये शुभे।
 
 
अनुवाद
वे कहते हैं, 'सभी देवताओं द्वारा पूजित पुण्यशाली कपिलादेवी, आपको नमस्कार है। ब्रह्माजी ने आपको अग्निकुण्ड से उत्पन्न किया है। आपकी महिमा अपार है और आपकी शक्ति महान है। कपिलादेवी, सभी तीर्थ आपके ही स्वरूप हैं और आप ही सबका कल्याण करने वाली हैं।'
 
‘They say, ‘Salutations to you, the virtuous Kapiladevi, worshipped by all the gods. Brahmaji has created you from the fire pit. Your glory is vast and your power is great. Kapiladevi, all the pilgrimages are your form and you are the one who brings good to all.’
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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