श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 103: कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन  »  श्लोक d31-d33
 
 
श्लोक  14.103.d31-d33 
देवा: पितृगणाश्चापि गन्धर्वाप्सरसां गणा:।
लोका द्वीपार्णवाश्चैव गङ्गाद्या: सरितस्तथा॥
देवा: पितृगणाश्चापि वेदा: साङ्गा: सहाध्वरै:।
वेदोक्तैर्विविधैर्मन्त्रै: स्तुवन्ति हृषितास्तथा॥
विद्याधराश्च ये सिद्धा भूतास्तारागणास्तथा।
पुष्पवृष्टिं च वर्षन्ति प्रनृत्यन्ति च हर्षिता:॥
 
 
अनुवाद
देवता, पितर, गन्धर्व, अप्सराएँ, लोक, द्वीप, समुद्र, गंगा आदि नदियाँ, शरीर के अंग और यज्ञों सहित सम्पूर्ण वेद, बड़े हर्ष के साथ नाना प्रकार के मन्त्रों द्वारा कपिला गौ की स्तुति करते हैं। विद्याधर, सिद्ध, भूत और तारे - कपिला गौ को देखकर पुष्प वर्षा करते हैं और आनन्द से नाचने लगते हैं।
 
The gods, the ancestors, the Gandharvas, the Apsaras, the worlds, the islands, the sea, the rivers like Ganga, the organs of the body and the entire Vedas along with the Yagyas, praise Kapila Cow with great joy with various mantras. Vidyadhar, Siddha, ghosts and stars - seeing Kapila cow, they shower flowers and start dancing in joy.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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