श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 103: कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन  »  श्लोक d3
 
 
श्लोक  14.103.d3 
याश्चैता: कपिला: प्रोक्ता दश चैव त्वया मम।
तासां कति सुरश्रेष्ठ कपिला: पुण्यलक्षणा:॥
 
 
अनुवाद
हे देवश्रेष्ठ! आपने जिन दस प्रकार की कपिला गायों का उल्लेख किया है, उनमें से कितनी गायें पवित्र मानी जाती हैं?'
 
O best of the gods! Out of the ten types of Kapila cows that you have mentioned, how many of them are considered sacred?'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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