| श्री महाभारत » पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व » अध्याय 103: कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन » श्लोक d22-d23 |
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| | | | श्लोक 14.103.d22-d23  | कर्णयोरश्विनौ देवौ चक्षुषी शशिभास्करौ।
दन्तेषु मरुतो देवा जिह्वायां वाक् सरस्वती॥
रोमकूपेषु मुनयश्चर्मण्येव प्रजापति:।
नि:श्वासेषु स्थिता वेदा: सषडङ्गपदक्रमा:॥ | | | | | | अनुवाद | | दोनों कानों में अश्विनीकुमार, नेत्रों में चन्द्रमा और सूर्य, दांतों में मरुद्गण, जिह्वा में सरस्वती, रोमकूपों में मुनि, त्वचा में प्रजापति तथा श्वास में षडंग, पाद और कर्म सहित चारों वेद निवास करते हैं। | | | | Ashwinikumar resides in both the ears, Moon and Sun in the eyes, Marudgan in the teeth, Saraswati in the tongue, Muni in the pores, Prajapati in the skin and all the four Vedas including Shadanga, Pada and Karma reside in the breath. | | ✨ ai-generated | | |
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