श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 103: कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन  »  श्लोक d21
 
 
श्लोक  14.103.d21 
चन्द्रवज्रधरौ चापि तिष्ठत: शृङ्गमूलयो:।
शृङ्गमध्ये तथा ब्रह्मा ललाटे गोर्वृषध्वज:॥
 
 
अनुवाद
सींगों के मूल में चंद्रमा और व्रजधारी इंद्र निवास करते हैं। सींगों के मध्य में ब्रह्मा और ललाट में भगवान शंकर निवास करते हैं।'
 
‘The moon and Vrajdhari Indra reside in the root of the horns. Brahma resides in the middle of the horns and Lord Shankar resides in the forehead.’
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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