श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 103: कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन  »  श्लोक d19
 
 
श्लोक  14.103.d19 
स मुक्तपाप: शुद्धात्मा यानेनाम्बरशोभिना।
मम लोकं व्रजेन्मुक्तो रुद्रलोकमथापि वा॥
 
 
अनुवाद
वह मुक्त, निष्पाप और शुद्धचित्त होकर आकाश की शोभा बढ़ाने वाले विमान द्वारा मेरे लोक या रुद्र के लोक में जाता है।
 
‘He, being free, sinless and having a pure mind, travels to my world or to Rudra’s world through a plane that enhances the beauty of the sky.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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