श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 103: कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन  »  श्लोक d18
 
 
श्लोक  14.103.d18 
कपिलापञ्चगव्येन समन्त्रेण पृथक् पृथक्।
यो मत्प्रतिकृतिं वापि शङ्कराकृतिमेव वा।
स्नापयेद् विषुवे यस्तु सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥
 
 
अनुवाद
जो व्यक्ति विषुवयोग में विभिन्न मंत्रों का पाठ करता है तथा कपिला के पंचगव्य से मेरी या शंकर की मूर्ति को स्नान कराता है, उसे अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है।
 
The one who recites different mantras during Vishuvayoga and bathes my or Shankar's idol with Kapila's Panchgavya, gets the results of Ashvamedha Yagya.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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