श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 103: कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन  »  श्लोक d15
 
 
श्लोक  14.103.d15 
कपिलाया घृतं क्षीरं दधि पायसमेव वा।
श्रोत्रियेभ्य: सकृद् दत्त्वा नर: पापै: प्रमुच्यते॥
 
 
अनुवाद
श्रोत्री ब्राह्मण को एक बार भी कपिला गाय का घी, दूध, दही या खीर दान करने से मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
 
‘By donating even once a Kapila cow's ghee, milk, curd or kheer to a Shrotri Brahmin, a man is freed from all sins.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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