श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 103: कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन  »  श्लोक d11-d12
 
 
श्लोक  14.103.d11-d12 
सुवर्णकपिला पुण्यास्तथा रक्ताक्षपिङ्गला।
पिङ्गलाक्षी च या गौश्च स्यात् पिङ्गलपिङ्गला॥
एताश्चतस्र: प्रवरा: पवित्रा: पापनाशना:।
नमस्कृता वा दृष्टा वा घ्नन्ति पापं नरस्य तु॥
 
 
अनुवाद
सुवर्ण कपिला, रक्ताक्ष पिंगला, पिंगलाक्षी और पिंगल पिंगला - ये चार प्रकार की कपिलाएँ श्रेष्ठ, पवित्र और पापों को दूर करने वाली हैं। इनके दर्शन और नमस्कार से भी मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं।
 
‘Suvarna Kapila, Raktaksh Pingala, Pingalakshi and Pingal Pingala – these four types of Kapilas are the best, pure and remove sins. Even by seeing and saluting them, a person's sins are destroyed.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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