श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 103: कपिला गौमें देवताओंके निवासस्थानका तथा उसके माहात्म्यका, अयोग्य ब्राह्मणका, नरकमें ले जानेवाले पापोंका तथा स्वर्गमें ले जानेवाले पुण्योंका वर्णन  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  14.103.d1 
वैशम्पायन उवाच
एवं श्रुत्वा परं पुण्यं कपिलादानमुत्तमम्।
धर्मपुत्र: प्रहृष्टात्मा केशवं पुनरब्रवीत्॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इस प्रकार परम पुण्यमयी कपिला गौ के उत्तम दान का वर्णन सुनकर धर्मपुत्र युधिष्ठिर का हृदय अत्यन्त प्रसन्न हुआ और उन्होंने पुनः भगवान श्रीकृष्ण से यह प्रश्न किया -
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! Thus, hearing the description of the excellent donation of the highly virtuous Kapila cow, the heart of Dharma's son Yudhishthira became very happy and he again asked Lord Krishna this question -
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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