श्री महाभारत  »  पर्व 14: आश्वमेधिक पर्व  »  अध्याय 101: पञ्चमहायज्ञ, विधिवत् स्नान और उसके अंगभूत कर्म, भगवान‍् के प्रिय पुष्प तथा भगवद्भक्तोंका वर्णन  »  श्लोक d4
 
 
श्लोक  14.101.d4 
तर्पणं ऋभुयज्ञ: स्यात् स्वाध्यायो ब्रह्मयज्ञक:।
भूतयज्ञो बलिर्यज्ञो नृयज्ञोऽतिथिपूजनम्।
पितृनुद्दिश्य यत् कर्म पितृयज्ञ: प्रकीर्तित:॥
 
 
अनुवाद
इनमें 'ऋभुयज्ञ' को तर्पण, 'ब्रह्मयज्ञ' को स्वाध्याय, समस्त प्राणियों के लिए अन्न त्याग को 'भूतयज्ञ', अतिथि पूजन को 'मनुष्ययज्ञ' तथा पितरों के उद्देश्य से किए जाने वाले श्राद्ध आदि कर्मों को 'पितृयज्ञ' कहते हैं।
 
In these, 'Ribhuyagya' is called Tarpan, 'Brahmayagya' is the name of Swadhyaya, sacrificing food for all the living beings is called 'Bhootayagya', worship of guests is called 'Manushyayagya' and the rituals like Shraddha etc. performed for the purpose of ancestors are called 'Pitriyagya'.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)