Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.99.d94-d95: जो क्रोधित हो, उससे कुछ मत माँगिए। जो ज्ञान से घृणा करता हो, उससे कुछ मत माँगिए। सभी जीवों के प्रति दयालु बनिए, चाहे वे स्थिर हों या गतिमान। दूसरों को भी उसी प्रकार समभाव से देखिए जैसे आप स्वयं को देखते हैं। | mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
कोपिनं तु न याचेत ज्ञानविद्वेषकारित:॥
स्थावरेषु दयां कुर्याज्जंगमेषु च प्राणिषु।
यथाऽऽत्मनि तथान्येषु समां दृष्टिं निपातयेत् ॥
अनुवाद
जो क्रोधित हो, उससे कुछ मत माँगिए। जो ज्ञान से घृणा करता हो, उससे कुछ मत माँगिए। सभी जीवों के प्रति दयालु बनिए, चाहे वे स्थिर हों या गतिमान। दूसरों को भी उसी प्रकार समभाव से देखिए जैसे आप स्वयं को देखते हैं।
Don't ask for anything from someone who is angry. Don't ask for anything from someone who hates knowledge. Be kind to all living beings, whether stationary or mobile. Look at others with equality just as you look at yourself.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥