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mahabharat 13.99.d92: सदैव कल्याणकारी बातें ही बोलें और प्रसन्नतापूर्वक कल्याणकारी कर्म करें। यदि कोई संन्यासी क्रोधित हो तो उसके सामने मौन रहें, उससे बात न करें।   |   mahabharat अध्याय 13.99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 99: सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति  »  श्लोक d92
 
 
श्लोक  13.99.d92 
श्रेय एवाभिधातव्यं कर्तव्यं च प्रहृष्टवत्॥
तूष्णीम्भावेन वै तत्र न क्रुद्धमभिसंवदेत्।
 
 
अनुवाद
सदैव कल्याणकारी बातें ही बोलें और प्रसन्नतापूर्वक कल्याणकारी कर्म करें। यदि कोई संन्यासी क्रोधित हो तो उसके सामने मौन रहें, उससे बात न करें।
 
Always speak only welfare-oriented things and happily perform welfare-oriented deeds. If a Sanyasi is angry, he should remain silent in front of him and not talk to him.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)